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Thursday, December 24, 2015

ठहर ज़रा

ज़रा ठहर ज़िन्दगी,
अभी  तो आई है,
जिस मोड़ पर थी ज़रूरत तेरी,
तुने वहीँ से रुखसत पाई है,

बैठ ज़रा,
शतरंज की बाजियां हों,
गुफ्तगू के दौर चलें,
सुनने को आज तेरी मेरी कहानियां हो,

पराजित तो कोई क्या कर सका तुझे,
काफी बुलंद लगते तेरे इरादे होंगे,
मात दे पाऊँ तुझे तो क्या?

अगली चाल में तेरे घर,
मेरे भी दो प्यादे होंगे,

देख उस खिड़की से बचपन में,
" सूरज " दिखाई आता है,
लिए मन में आशा,
दौड़े घास में नंगे पैर,
बेफिक्र बेतहाशा,

जिसे ज़िन्दगी,

तेरी रीतियों का होश नही है,
साफ़ है दिल जिसका अभी,
मैली कमीज है,
पर सोच नहीं है,

दिन--दिन देख तेरी,
शैतानी रतनार नुमाइशें,

मैं हैरान हो  गया,

जब खाई ठोकर तेरी राहों में,
तो मैं जवान हो गया,

खो गया किस तरह,
तू ही बता, ज़िन्दगी!

मैं क्या था और क्या हो गया,
तू ही बता, ज़िन्दगी!

तूने सितम तो सभी पर ढाए हैं,
भूख लगती है,
तो लोग रोटी खाते है,
मैंने चक्कर खाए हैं,

तुझे लगा होगा,
कि यह तो सरल हो गया,

जिस थल में,
मैं गिरा चक्कर खाकर,
वहीँ मेरा मखमल हो गया,

जब नींद खुली सवेरे मेरी,
तो करी निंदा तेरी, ज़िन्दगी!

मेरी हार पर,
तूने लगाये ठहाके,
मैं हुआ शर्मिंदा, ज़िन्दगी!

पासों की तरह फेंका तूने,
दुनिया की चौकड़ी में,

मैं पलट जाऊं या रहूँ जैसे भी,
तेरी चाल तो तू चल ही गयी, ज़िन्दगी!

खैर जा तू अब,
कोई खड़ा हाथ जोड़े,
सिर झुकाए भीख में,
किसी के लिए,
माँग रहा है तुझे,

जा किसी को मुक्त कर दे इस बंधन से,


जा किसी की हो जा, ज़िन्दगी!

Tuesday, December 8, 2015

साया

क्या वजूद इसका,
क्या कहानी है,
इसके होने का अस्बाब क्या,
मिला इसे ऐसा खिताब क्या,

आलिमों फाज़िलों को भी,
तस्सवुर नहीं इस राज़ का

तन का यह असीर हो गया,
मन का यह नसीर हो गया,

तुम्हारी गलतियों को माफ़कर,
तुम्हारी नादानियों को जानकर,
तुम्हारी हर शर्त को मान कर,
जो साथ तुम्हारे आया है,
कहते इसको साया है,

तुम भीगे तो यह भीगा,
तुम दौड़े तो यह दौड़ा,
तुम लगे जलने,
तो यह भी हो गया भस्म,

तुम ही से यह होता शुरू,
तुम ही पे होता ख़त्म,

जो विघ्नो में साथ छोड़ दे,
यह वो यार नहीं,

यह तो दुआ है,
किसी अपने की,

यह तो कल्पना है,
किसी सपने की,

यह तो याद है,
किसी ख़ास की,
यह लिए बेचैनी है,
किसी प्यास की,

साथी है जैसे,

मलाल है किसी कायर का,
कलम दवात है किसी शायर का,
सुर है सितार का,
दर्द है प्यार का,
मायूसी किसी हार पे,
आंसू किसी रुखसार पे.


साया चलता बटोरे,
हर उज्जवल याद को,

रहता साथ सिर्फ,
उजले पल में,
अँधेरे में जाने की,
इसको आदत नहीं,

यह तो जीया सिर्फ तुम्हारे लिए,
फिर भी तुम्हे लगता,कि
तुम्हे मिलती चाहत नहीं,

लेकर कई राज़ तुम्हारे,
दफ़न होता साथ तुम्हारे,

इसको रहता याद है,
तुम्हे किस चीज़ का गम,
किस चीज़ का मलाल है,

क्या तुमने खोया,
क्या तुमने पाया,

मेरा साया भी रखता इल्म,
की मैंने कितने पल किये ज़ाया हैं, 

कहते इसको साया है,

Thursday, October 1, 2015

अंतिम संकल्प

विष बोली कर श्रवण मैं,
सांस ना मिले इस पवन में,
ऊंच नीच देख लोक काल,
उलझाये मुझे मेरे स्वपन जाल,

अगर उठाये मैंने वदन बचाव में,
करना पड़ा सहन सभी इन घाव में,

रख कर ख़ुशी सब ताक में,
जब चला निर्भय तो मिल गया खाख में,
देखूं दूर कहीं तलाश में,
दोष खुदी में पाता हूँ,
चाहता हूँ कहना बहुत कुछ,
पर कह कुछ नहीं पाता हूँ,

विलाप में करता हूँ,
पर अश्रु विलुप्त रहते हैं,
कोई समझा नहीं यह राज़,
उल्टा पीढ़ मुझे और देते है ,

आंसू गिरते उनके जब सुनते मेरी बात में,
अम्बर को रोता देखा है मैंने घनी रात में,
 समझ चूका हूँ अब कोई नहीं मेरे साथ में,



नहीं किसी का हाथ अब मेरे हाथ में,

रात घनी अभी भी कटी नहीं,
चल रहा हूँ में,
नम हूँ तन से,
लेकिन अंदर कहीं सुलग रहा हूँ में,

ना शिकवा किसी से,
ना कोई शिकायत है,
ना प्यार किसी का,
ना किसी की इनायत है,

अजीब यह इत्तफाक है,




ना यह सब  कोई लतीफा है,
ना कोई मज़ाक है,

चेहरे पर फिर भी मुस्कान है,
लगने लगा आगे रास्ता आसान है,

रखता हूँ अब कलम,
महान यह क्षण,
यह पल है,

महान यह मेरा अंतिम संकल्प है॥